युगपुरुष कविवर 'सूर्य'

साहित्यिक व्यक्तित्व एवं कृतित्व

युगपुरुष कविवर 'सूर्य' हिंदी साहित्य-जगत् के देदीप्यमान सूर्य, उदार हृदय, और सरल स्वभाव के धनी, एक महान मानवतावादी और दार्शनिक व्यक्तित्व हैं। जाति, धर्म और देश की सीमाओं से ऊपर उठकर वे प्रत्येक मनुष्य के प्रति करुणा, प्रेम और सहानुभूति रखने वाले एक बहुआयामी रचनाकार हैं।

उनकी शख्सियत अत्यंत आत्मविश्वासी, दृढ़ निश्चयी, आध्यात्मिक और बुद्धिमत्ता से भरी हुई है, जिसमें समाज-सुधार और मानवीय उत्थान का अनुपम संगम देखने को मिलता है। सामाजिक रूपांतरण तथा चेतना के जागरण को उन्होंने जीवन का सर्वोच्च ध्येय बनाया है।

उनकी लेखनी में मानवीय करुणा, सामाजिक सरोकार, आध्यात्मिक चिंतन और राष्ट्रीय भावना की गहन अभिव्यक्ति मिलती है। वे नारी शक्ति के प्रति अगाध सम्मान रखने वाले तथा आधुनिक भारत के प्रखर विचारक हैं।

समाज-सुधार एवं लेखन

युगपुरुष 'सूर्य' जी सामाजिक कुरीतियों, पाखंडवाद और अमानवीय परंपराओं के कट्टर विरोधी हैं। उन्होंने अपनी ओजस्वी कविताओं और लेखों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों के विरुद्ध लगातार आवाज उठाई, तथा मानवीय नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए निरंतर प्रयास किए।

जन्म-भूमि

डौला, जनपद बागपत, उत्तर प्रदेश — यह पावन धरती कविवर सूर्य जी की जन्म-स्थली है। यहीं से उन्होंने एक महान साहित्यकार, चिंतक और समाज-सुधारक के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ की।

व्यक्तित्व और विशेषताएँ

वे हिंदी और संस्कृत भाषाओं के अनुपम ज्ञाता हैं तथा इनसे गहरा प्रेम करते हैं। आधुनिक समय में मानवीय मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और सभ्यता-संस्कृति की रक्षा के लिए उनका योगदान अनुपम है।